मंगलवार 7 अप्रैल 2026 - 06:14
हज़रत हम्ज़ा को ‘सैय्यद अल-शोहदा’ की उपाधि क्यों दी गई?

हौज़ा / सैय्यद अल-शोहदा, की उपाधि सर्वप्रथम रसूल-ए-खुदा (स.अ.व.) द्वारा हज़रत हम्ज़ा इब्ने अब्दुल-मुत्तलिब को यहुद के युद्ध में उनकी शहादत के बाद दी गई थी, और उसके बाद, कई रिवायतों के आधार पर, यह उपाधि रसूल-ए-खुदा (स.अ.व.) द्वारा हुसैन इब्ने अली को दी गई।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,इस्लामी इतिहास में दो महान हस्तियाँ 'सैय्यद-उश-शोहदा'(शहीदों के सरदार)की उपाधि से जानी जाती हैं,हमज़ा बिन अब्दुल-मुत्तलिब और हुसैन बिन अली।यह स्पष्ट है कि इस उपाधि का अर्थ है कि एक शहीद अन्य शहीदों पर श्रेष्ठ और फ़ज़ीलत वाला है।जैसा कि कुछ कथनों में इमाम हुसैन(अ.स.)के लिए 'सैय्यद-उश-शोहदा' के साथ 'अफ़ज़ल-उश-शोहदा'(सर्वश्रेष्ठ शहीद)भी कहा गया है।यह उपाधि सबसे पहले रसूल-अल्लाह(स.अ.व.)ने हज़रत हमज़ा बिन अब्दुल-मुत्तलिब, जो कि नबी (स.अ.व.)के चाचा थे और अहद की लड़ाई में शहीद हुए थे को अता की थी और उस वक़्त से हज़रत हमज़ा को 'सैय्यद-उश-शोहदा' के ख़िताब से याद किया जाने लगा।

हज़रत हमज़ा अपने उच्च ईमान, इस्लाम के समर्थन में अपने शानदार अतीत, और रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व.)की व्यक्तिगत सहायता और सुरक्षा के कारण हमेशा उनके विशेष ध्यान और प्रेम के पात्र रहे।इस्लाम के इतिहास में हज़रत हमज़ा का त्याग,बलिदान और उनकी असाधारण वीरता प्रसिद्ध है।

जैसा कि यहुद की लड़ाई में भी उन्होंने इस ईमान,बलिदान,साहस और वीरता के कुछ दृश्य प्रदर्शित किए।इन गुणों के अलावा उनकी शहादत की प्रकृति और उहुद के शहीदों के बीच उनकी अत्यधिक अलगाव और करबला की स्थिति भी अद्वितीय रही है।

जैसे कि उहुद की लड़ाई में भी इस आस्था, बलिदान, साहस और वीरता के दृश्य प्रदर्शित किए गए थे।इन गुणों के साथ-साथ उनकी शहादत का तरीका और उहुद के शहीदों के बीच और उससे पहले और बाद में उनकी चरम अलगाव और मासूमियत भी अद्वितीय थी।

उपरोक्त बातों के अनुसार,हम्ज़ा को‘सैय्यद अल-शुहदा’(शहीदों का सरदार) की उपाधि दी गई और उन्होंने इस्लाम के अन्य महान शहीदों पर श्रेष्ठता प्राप्त की। शिया इमामों ने भी हम्ज़ा बिन अब्दुल-मुत्तलिब के लिए ‘सैय्यद अल-शुहदा’ की उपाधि को दोहराने पर जोर दिया और पैगंबर के परिवार के लिए एक उच्च आध्यात्मिक गौरव के रूप में हम्ज़ा अल-सैय्यद अल-शुहदा से जुड़ाव का उल्लेख किया।

लेकिन सवाल यह है कि सैयद अल-शुहदा (शहीदों के सरदार)की उपाधि सबसे पहले इमाम हुसैन(अ.स.)को कब और किसके द्वारा दी गई थी?

कुछ रिवायतों के अनुसार, इमाम हुसैन(अ.स.) के लिए ‘सैय्यद अल-शोहदा’(शहीदों के सरदार) की उपाधि का इस्तेमाल सबसे पहले जिब्रील द्वारा किया गया था। पैगंबर (स.अ.व.)ने ईश्वर के करीबी फरिश्तों से प्राप्त इमाम हुसैन(अ.स.) की शहादत की खबर विशेष रूप से अपने खास साथियों और करीबी रिश्तेदारों को कई बार बताई थी।

इनमें से एक रिवायत में पैगंबर (स.अ.व.)ने ईश्वर की ओर से हुसैन-बिन-अली(अ.स.)को ‘सैय्यद अल-शुहदा’(शहीदों के सरदार)के रूप में पेश किया और कहा:वह (हुसैन)दुनिया और आखिरत में पहले से लेकर आखिरी तक शहीदों के सरदार हैं और जन्नत के तमाम बाशिंदों के नौजवानों के सरदार हैं।

एक अन्य प्रसिद्ध रिवायत के अनुसार जिसे अधिकांश स्रोतों ने उल्लेख किया है रसूल-ए-खुदा (स.अ.व.)जो जिब्रील से अपने बेटे की शहादत की खबर दे रहे थे ने एक दुआ में हुसैन के लिए सैय्यद अल-शोहदा’ का मकाम मांगा और खुदा से दुआ की कि हुसैन को शहीदों के सरदारों (सदात अल-शोहदा)और उनके सरदार (सैय्यद अल-शोहदा)में से बना दे।

इस रिवायत में सदात अल-शोहदा’ (शहीदों के सरदार)का प्रयोग इसी अर्थ (सैय्यद अल-शुहदा) को व्यक्त करता है।इस प्रकार ‘सैय्यद अल-शुहदा’ की उपाधि सर्वप्रथम रसूल-अल्लाह (स.अ.व.)द्वारा अपने महानुभाव पौत्र (हुसैन)को प्रदान की गई थी और उसके बाद अन्य इमामों ने इसके दोहराए जाने पर जोर दिया।

एक रिवायत के अनुसार इमाम सादिक (अ.स.) ने उम्म सईद अल-अहमासीय्याह से जिन्होंने मदीना में शहीदों की कब्रों पर जाने के लिए एक सवारी किराए पर ली थी कहा:तुम सैय्यद अल-शेहदा की जियारत क्यों नहीं करती?

उन्होंने पूछा:सरदार-ए-शहादा (सैय्यद अल-शोहदा)कौन हैं?उन्होंने जवाब दिया: हुसैन-बिन-अली(अ.स.)इस प्रकार ‘सैय्यद अल-शोहदा’ की उपाधि सर्वप्रथम रसूल-ए-खुदा (स.अ.व.)द्वारा हज़रत हम्ज़ा इब्न अब्दुल-मुत्तलिब को उहुद के युद्ध में उनकी शहादत के बाद दी गई थी।

उसके बाद कई रिवायतों के आधार पर यह उपाधि रसूल-ए-खुदा (स.अ.व.)द्वारा हुसैन इब्न अली (अ.स.)को उनकी शहादत से पहले, उनकी शहादत की खबर देते समय प्रदान की गई थी।

और मुख्य रूप से कर्बला में उनकी  अत्याचारपूर्ण शहादत के बाद शिया इमामों द्वारा इस पर जोर दिया गया और कुछ दुआओं और जियारतनामों में दोहराया गया यहाँ तक कि यह उनकी सबसे प्रसिद्ध उपाधियों में से एक बन गई।”

लेखक:  मौलाना तहसीन रज़ा
क़ुम,ईरान

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